महाराष्ट्र में दलित आंदोलन
अथवा
दलित आंदोलन में ज्योतिबा फुले की भूमिका
भारत के दलित आंदोलन के नायकों में ज्योतिबा फुले का नाम उल्लेखनीय है। इन्होने पश्चिम भारत में दलित आंदोलन को व्यापका आधार दिया | ज्योतिबा फुले को सामाजिक रूप से जाति भेद-भाव एवं छुआ-छूत जैसे अमानवीय व्यव्हार का सामना करना पड़ा जिससे उन्हें इन कुरीतियों को विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा मिली |
फुले जाति व्यवस्था को मानव सभ्यता के विरुद्ध मानते थे। उनका विचार था कि भारतीय समाज में जब तक जाति व्यवस्था विद्यमान है तब तक अछूत गुलामी का जीवन जीने को मजबूर रहेगा। वे मूर्ति पूजा, कर्म कांड, पुनर्जन्म एवं स्वर्ग की कटु आलोचना करते थे। वे एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे ।
फुले का मानना था कि आर्य विदेशी मूल के हैं, उन्होंने द्रविड़ लोगों को हराकर जाति व्यवस्था स्थापित की है। शूद्र इस भारत भूमि के निवासी है। उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता पर भी बल दिया| वह महिलाओं शोषण के खिलाफ थे। उन्होने स्त्री तथा शूद्रों की शिक्षा हेतु विद्यालयों कि एक श्रृंखला के स्थापित की ।
उन्होंने खेतिहर मजदूरों तथा छोटे किसानों की समस्याओं को लेकर भी संघर्ष किया ।
अपने विचारों के प्रचार हेतु फुले ने मराठी में दीनबंधु नामक पत्रिका की शुरूआत की ।
1873 ई. में उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। जिसमें उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों के शोषण का वर्णन किया। शुद्रों के गुलामी की तुलना अमेरिका के नीग्रो से की गई है।
अपनी विचारधारा एवं संघर्ष को सांगठनिक स्वरूप देने के लिए उन्होंने सत्य सोधक समाज की स्थापना की ।
इस प्रकार फुले ने ब्राहमणवादी व्यवस्था, जातिभेद के विरुद्ध पूरे जीवन संघर्ष किया। दलित आंदोलन के नायक के तौर पे वह हमेशा याद किए जाऐंगे ।
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