भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय | bharat mai aarthik rashtravad | ba history notes


भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय 


दादा भाई नौरोजी भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद जनक थे । उन्होने एक ओर जहां ब्रिटिश शासन की आर्थिक दोहन की नीति के कारण भारत में बढ़ती दरिद्रता पर प्रकाश डाला, वहीं उन्होने भारतीयों को आर्थिक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनथक प्रयास किए ।

उनके ग्रन्थ Poverty and un-British rule in India को भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद की आधार पुस्तक माना जा सकता है।

राष्ट्रीय आंदोलन के अन्य सभी नेताओं ने तथा भारतीय समाचार पत्रों भी सरकार के हर शोषक पहलू को उभारा तथा भारत को आर्थिक पुनरुद्धार हेतु सृजनात्मक सुझाव दिए।

भारत में देशप्रेम की भावना जागृत करने में और आधुनिक उद्योगों का विकास तथा कुटीर उद्योगों का पुनरुत्थान करने में आर्थिक राष्ट्रवाद का अभूतपूर्व योगदान रहा।

उर्दू शायर अल्ताफ हुसेन हाली हाली ने भारत के आर्थिक पुनरुत्थान के लिए भारतीय उद्योग और वाणिज्य को आधुनिक तकनीक से विकसित किए जाने पर जोर दिया |

अपनी रचना नज्म हुब्बे वतन में उन्होने भारतीयों को इस बात पर फटकार लगाई कि वे अब भी अपने मिथ्या जातीय गौरव की शान बघारने से बाज नही आ रहे हैं। और इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि वे गुलामी और गरीबी में अपने दिन काट रहे हैं।

इज्जतौ कौम चाहते हो अगर, जाके जलाओं उनमें इल्मो-हुनर,

जात का फख्र और नस्ल का गुरूर, उठ गए जहाँ से ये दस्तूर। 

कौम की इज्जत अब हुनर से है, इल्म से याकि सीमोजर से है, 

एक दिन वो दौर आयेगा, बे-हुनर भीख तक न पाएगा ।


दयानंद सरस्वती ने भारत के आर्थिक पुनरुत्थान के लिए स्वदेशी का प्रचार किया। अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने यूरोपीयों के देशप्रेम की प्रशंसा की थी -


यूरोपीयन अपने स्वजाति की उन्नति के लिए तन मन धन व्यय करते हैं। आलस्य को छोड़ उद्योग किया करते हैं।
देखो ! अपने देश के बने जूते को कार्यालय कचहरी में जाने देते हैं इस देशी जूते को नही ।


बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी रचनाओं में अन्याय का निर्भीक होकर प्रतिकार करने का संदेश दिया | वंदेमातरम् गीत भी इन्हीं की रचना है।


इस प्रकार हम देख सकते हैं कि किस प्रकार साहित्यकारों ने आर्थिक राष्ट्रवाद के विकास में अपना योगदान दिया ।

Bharat mai aarthik rashtravad

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