•चौरीचौरा काण्ड
•असहयोग आन्दोलन की समाप्ति
4 फ़रवरी, 1922 को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के एक गांव चौरीचौरा में आन्दोलनकारी जुलूस निकाल रहे थे। जुलूस को रोकने के लिए सिपाहियों ने भीड़ पर गोली चला दी। 26 आन्दोलनकारी मारे गए और अनेक घायल हो गए। गोलियां समाप्त होने पर सिपाही थाने में छुप गए। क्रोधित भीड़ ने थाने को आग लगाकर 22 सिपाहियों को मार डाला। इस हत्याकांड की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए गांधी जी ने 12 फ़रवरी, 1922 को असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया। गांधीजी ने घोषित किया -
मैं स्वराज्य सिर्फ़ अहिंसा और सत्य के द्वारा प्राप्त करना चाहता हूँ।
कांग्रेस समिति के 1922 के बारदोली प्रस्ताव द्वारा असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया गया और कांग्रेसियों को यह निर्देश दिया गया कि वह राष्ट्रीय पाठशाला, अस्पृश्यता निवारण तथा हिन्दू मुस्लिम एकता के कार्यों में अपना समय लगाएं। इस निर्णय से आन्दोलनकारियों को भारी धक्का लगा। छुटपुट हिंसा की घटनाओं के कारण देश-व्यापी आन्दोलन के स्थगन का निर्णय उन्होंने कभी भी अपने दिल से स्वीकार नहीं किया। सुभाषचन्द्र बोस ने इस निर्णय की खुलकर आलोचना की। इस निर्णय का विरोध होने पर भी गांधीजी ने इसे वापस नहीं लिया क्योंकि उनके लिए स्वराज से भी अधिक महत्व अहिंसा का था।
