जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद स्वशासन न दिए जाने से निराश जनता सरकार के विरूद्ध आंदोलन करने को तत्पर थी।
रॉलेट एक्ट पारित होने से जनता का आक्रोश अपने चरम बिंदू पर पहुंच गया था। इसलिए रॉलट एक्ट विरोधी कई आंदोलन होने लगे।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन रॉलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनसभा हो रही थी।
वहां उपस्थित निहत्थे आंदोलनकारियों पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी के अधाधुंध गोलियां बरसा दी । जनरल डायर के सिपाही तब तक भागती भीड़ पर गोलियां बरसाते रहे जब तक कि उनकी गोलियां खत्म नही हो गई।
जलियांवाला बाग की तंग गलियों में फौज की गाड़ियां लाना सभंव नही था, नही तो जनरल डायर भीड़ को इन भारी भरकम गाड़ियों से भी कुचलना चाहता था ।
इस हत्याकाण्ड से जनरल डायर भारतीयों को सबक देना चाहता था कि उनके आंदोलनों को कुचलने के लिए वह किस हद तक जा सकता है।
रॉलट एक्ट के कारण इस निर्मम अत्याचार की घटना अखबारों में तक नहीं छपने दी ।
30 मई 1919 को जालियांवाला बाग काण्ड के विरोध में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि का परित्याग कर दिया |
