अर्थ परिवर्तन की दिशाएं BA Hindi 3rd year

Arth Parivartan ki dishaen

This question is asked for 20 marks in 3rd year of Hindi in UTTRAKHAND OPEN UNIVERSITY and MBPG COLLEGE 

Types of questions for exam - 

अर्थ परिवर्तन की दिशाओं को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए


 अर्थ परिवर्तन की दिशाएं 


अर्थ परिवर्तन की तीन दिशाएं होती हैं- 

1.अर्थ संकोच 
2.अर्थ विस्तार  
3.अर्थादेश

अर्थ विस्तार  

शब्द में बिना किसी परिवर्तन के, अर्थ विस्तार होना प्रत्येक विकाशशील भाषा का का स्वाभाव है। हिन्दी भाषा का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसमें यह प्रक्रिया आवश्यक व स्वाभाविक है।
प्रारंभ में किसी शब्द का एक निश्चित अर्थ होता है, किन्तु धीरे धीरे उसके प्रयोग में विविधता आ जाती है। इसलिए वह व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है।अपनी व्यापकता में मूल अर्थ भुला दिया जाता है व्यापक अर्थ ही सामान्य हो जाता है।     

जैसे- प्रारंभ में केवल तिल के रस को 'तेल' कहते थे। धीरे धीरे सरसों, नारियल, बादाम आदि के रस को भी तेल कहा जाने लगा।
इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी देखे जा सकते हैं-

'स्याह' का अर्थ काला है। इसी से स्याही बना। किन्तु अब लाल, नीली, हरी सभी तरह की 'स्याही' है।

वीणा बजाने में पारगंत व्यक्ति को 'प्रवीण' कहा जाता था ।अब किसी भी कार्य में कुशल व्यक्ति को 'प्रवीण' कहते हैं।
व्यक्तियों के नाम पर भी अर्थ विस्तार देखा जा सकता है  जो उनके गुणों और कार्यों के कारण रूढ़ हो गया |
जैसे - 

विभीषण- घर का भेदी
नारद - लड़ाई कराने वाला 
कुबेर - धनवान व्यक्ति

इसी प्रकार संख्यावाची शब्दों में भी अर्थ परिवर्तन देखा जा सकता है ।

भारतीय दण्ड विधान में 420 की धारा धोखाधड़ी और की 110 धारा जनता की निगाह में बुरे व्यक्ति पर लगती है इसी आधार पर धोखेबाज व्यक्ति के लिए 'चार सौ बीस' और बुरे व्यक्ति के लिए 'दस नम्बरी' शब्द चलने लगा।


अर्थ संकोच 

सामान्य या विस्तृत अर्थ जब विशिष्ट अर्थ में सीमित हो जाता है तो इसे अर्थ संकोच कहते हैं।
उदाहरण -

पहले सभी पशुओं के लिए 'मृग' शब्द प्रचलित था, परंतु धीरे धीरे मृग केवल हिरन के अर्थ में संकुचित हो गया ।

अर्थ संकोच की प्रवृत्ति को अच्छी तरह से समझने के लिए कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं -

Arth Parivartan


अर्थादेश 

भावों की समानता के कारण कभी कभी शब्द के मुख्य अर्थ के साथ अन्य गौण अर्थ भी चलने लगते हैं। कुछ समय बाद मुख्य अर्थ तो लुप्त हो जाता है और गौण अर्थ ही प्रचलन में मुख्य हो जाता है।

"मुख्य अर्थ के लोप होने और उसके स्थान पर नवीन अर्थ के चलन को अर्थादेश कहते है" |

जैसे - 'असुर' पहले देववाची शब्द था जिसका अर्थ देवता था, किन्तु असुर अब - राक्षसवाची हो शब्द गया है।

अच्छे बुरे भाव की दृष्टि से अर्थादेश के दो भेद किए गए हैं-

1. अर्थोपकर्ष -

 सामाजिक दृष्टि से किसी शब्द का प्रारंभ में अच्छा अर्थ जब बुरे भाव में परिवर्तित हो जाता है तब अर्थोपकर्ष होता है।
जैसे पहले 'हरिजन' शब्द का मतलब था - भक्त परंतु अब हरिजन का अर्थ किसी जाति- विशेष तक सीमित रह गया
'प्रणाली' ( रास्ता या युक्ति) से निकला ' पनारी' या 'पनारा' ( गंदा नाला / नाली) भी अर्थोपकर्ष का उदाहरण है

2. अर्थोत्कर्ष - 

यह अयोषकर्ष का उल्टा है। इसमे पूर्व में प्रचलित बुरे भाव का अर्थ बाद में अच्छे भाव में प्रचलित हो जाता है।
जैसे 'साहस' पहले व्यभिचार, हत्या जैसे बुरे भाव का शब्द था परंतु अब साहस व साहसी व्यक्ति की सभी प्रशंसा करते हैं।


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