हिन्दी भाषा का उद्भव एवं विकास BA 3rd year Hindi

This question is asked for 20 marks in 3rd year of Hindi in UTTRAKHAND OPEN UNIVERSITY and MBPG COLLEGE 

Types of questions for exam

हिंदी भाषा के विकास क्रम को स्पष्ट कीजिए

अथवा

•हिंदी भाषा के उद्भव एवं विकास पर चर्चा कीजिए


हिन्दी का उद्भव एवं विकास


हिन्दी भाषा के उद्भव एवं विकास की रूपरेखा की समझ के लिए 'भाषा' की समझ होना अनिवार्य है।

भाषा -

भाषा विचारों एवं भावनाओं के आदान प्रदान का एक जरिया है , जिसके द्वारा हम अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं और दूसरों की बात को हम समझ सकते है।

भाषा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ' भाष्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है- व्यक्त वाणी।

''मनुष्यों के बीच अपनी इच्छा और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों का जो व्यव्हार होता है, उसे भाषा कहते हैं'' । 


हिन्दी भाषा का उद्भव एवं विकास 

हिन्दी भाषा के विकास का संबंध अपभ्रंश से जुड़ा हुआ है। संस्कृत भाषा से कई प्राकृत विकसित हुई और उन प्राकृतों से अपभ्रंश । इन अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का जन्म हुआ ।

हिन्दी भाषा के विकासक्रम को मुख्यत: तीन चरणों में विभक्त किया गया है -


1. हिन्दी भाषा का आदिकाल 

हिन्दी भाषा का आदिकाल 1000 ई0 से 1500 ई0 तक माना जाता है।

भाषा की दृष्टि से इस काल को 'संक्रांति काल' कहा जाता है, क्योंकि अपभ्रंश भाषा अपना रूप परिवर्तित कर रही थी। इस काल के अपभ्रंश को 'अवहट्ट' कहा गया है।कुछ लोगों ने इसे ही पुरानी हिन्दी कहा है। 

इस काल में हिन्दी भाषा अपने निमार्ण की प्रक्रिया से गुजर रही थी। खड़ी बोली का आरंभिक रूप अमीर खुसरो तथा बाद में कबीर के साहित्य में स्पष्टतया दिखने लगता है। जैन,बौद्ध, नाथ लोक कवि आदि के माध्यम से हिन्दी के विविध रूप हमें देखने को मिलते है । 

राजस्थानी खड़ी बोली व अपभ्रंश के मिश्रण से डिंगल शैली का प्रचलन हुआ । रासो साहित्य के उपर डिंगल शैली का प्रभाव देखा जा सकता है।

 इसी प्रकार अपभ्रंश व ब्रजभाषा के मिश्रण से पिंगल शैली का जन्म हुआ। 

वहीं, खड़ी बोली व फारसी के प्रभाव से ' हिन्दवी' की शैली प्रचलित हुई।


2. हिन्दी भाषा का मध्यकाल 

हिन्दी भाषा का मध्यकाल 1500 ई. से 1800 ई. तक है।इस समय तक खड़ी बोली, भाषा के रूप में अस्तित्व ले चुकी थी लेकिन अवधि और ब्रजभाषा ही साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध भाषाएं बन पाई थी। यद्यपि मौखिक सम्प्रेषण, सामाजिक सम्प्रेषण के रूप में खड़ी बोली लोक में बराबर चल रही थी। 

भाषा की दृष्टि से इस काल को हिन्दी भाषा का स्वर्णकाल कहा गया है।

सूर, तुलसी, मीरा, रहीम, रसखान जैसे सैकड़ों कवियों ने इस काल के भाषा एवं साहित्य की वृद्धि की है।

इस काल में हिन्दी भाषा में फारसी शब्दों का बड़ी संख्या में समावेश हो गया। तुलसी व सूर जैसे कवियों में भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है ।


3. हिन्दी भाषा का आधुनिक काल 

हिन्दी भाषा का आधुनिक काल 1800 ई0 से अब तक है। इस समय तक गद्य के रूप में खड़ी बोली की रचनाएं सामने आनी शुरू हो गई थी। अकबर के दरबारी कवि गंग की चन्द्र छन्द बरनन की महिमा तथा राम प्रसाद निरंजनी की भाषा योग वशिष्ठ जैसी रचना में हमें खड़ी बोली गद्य का दर्शन होता है।

लेकिन खड़ी बोली का वास्तविक प्रसार फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के बाद होता है। अंग्रेजी राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए अंग्रेज़ों ने बड़ी संख्या में हिन्दी भाषा में पाठ्य पुस्तकें तैयार करवाई।

फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रिंसिपल गिलक्राइस्ट के निर्देशन में लल्लू लाल व इंशा अल्ला खां ने भाषा की पुस्तकें तैयार कराने में मदद की

इसी समय पत्र-पत्रिकाओं ने भी हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में अपना योगदान दिया |

भारतेन्दु हरिचन्द्र के आगमन से खड़ी बोली के प्रसार में युगांतकारी परिवर्तन आया। कविता की भाषा पहले ब्रज और अवधि हुआ करती थी अब खड़ीबोली में भी  लिखी जाने लगी। गद्य की नई विधाएं उपन्यास, कहानी, जीवनी आत्मकथा , संस्मरण आदि हिन्दी में प्रचलित होने लगे |हिंदी भाषा ने अंग्रेजी फारसी व अन्य कई भाषा के शब्दों को ग्रहण किया |



Hindi Bhasha ka vikas kram





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